24 घंटे के भीतर पाए पाइल्स के दर्द से राहत

पाइल्स ट्रीटमेंट सर्विस प्रोवाइडर दिल्ली  में :-

बवासीर एक ऐसा रोग है, जिसका दर्द किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए असहनीय होता है। मलाशय के आसपास की नसों की सूजन के कारण बवासीर जैसी गंभीर बीमारी विकसित होती है। बवासीर के दो प्रकार होते हैं अंदरूनी और बाहरी। अंदरूनी बवासीर में नसों की सूजन नहीं दिखाई देती लेकिन यह पीड़ित व्यक्ति को महसूस होती है। बाहरी बवासीर में सूजन गुदा के बिलकुल बाहर दिखाई देती है। मलत्याग के समय मलाशय में अत्यधिक पीड़ा और इसके बाद रक्तस्राव, खुजली इसके लक्षण हैं, जिससे बवासीर की पहचान आसान हो जाती है। अगर आप भी इस घातक बीमारी से परेशान हैं तो आप हमे मोबाइल नंबर 9999219128 पर कॉल कर सकते है |

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दिल्ली/एनसीआर में पाइल/फिस्टुला/फिशर के इलाज के लिए सर्वश्रेष्ठ केंद्र(BEST CENTRE FOR TREATING PILE/FISTULA/FISSURE IN DELHI/NCR)

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बवासीर जिसे पाइल्स एवं अर्श रोग भी कहा जाता है, बेहद तकलीफदेह होता है। इस समस्या में रोगी को गंभीर कब्ज तो होता ही है, मलद्वार में असहनीय तकलीफ, कांटों सी चुभन, मस्से एवं घाव, जलन आदि गंभीर समस्याएं हैं, जो रोगी को कमजोर बना देती हैं और मल द्वारा रक्त की भी हानि होती है। ऐसे में इसका सही इलाज ही रोगी को इस समस्या में राहत दे सकता है, अन्यथा तकलीफ बढ़ सकती है।

बवासीर क्या है?

बवासीर गुदाद्वार के निचले हिस्से में मौजूद रक्त शिराओं में आने वाली सूजन है। हालांकि यह गुदाद्वार के भीतर होता है, लेकिन कई बार आप इसे गुदाद्वार के बाहर भी एक उभरे हुए मस्सों के रूप में महसूस कर सकते हैं। इस स्थिति को ‘प्रोलैटस्ट’ बवासीर कहते हैं। अकसर तीन में से एक व्यक्ति को किसी न किसी उम्र में बवासीर अवश्य होता है।

बवासीर के लछण :

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बवासीर एक तकलीफ दायक स्थिति है, इसमें शुरुआत में गुदाद्वार के सिरे पर खुपली आती है और अगर बवासीर की तकलीफ बढ ज़ाए तो इस जगह पर दर्द भी होता है और कई बार खून भी आने लगता है। आप को गुदाद्वार के हिस्से में भारीपन सा महसूस होता है या फि शौच के समय तकलीफ या दर्द भी होता है। शौच के बाद कई बार आपको अंदर के कपडो पर खून के धब्बे भी नजर आते हैं। यदि आप का बवासीर मस्से के रूप में बाहर आ जाए तो शौच के बाद धोते समय आप इन मस्सों को अपने हाथों पर भी महसूस कर सकते हैं।

यह क्यों होता है?

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इसका सबसे मुख्य कारण है कब्ज की परेशानी, अकसर कब्ज से ग्रस्त व्यक्ति शौच के समय काफी जोर लगाते हैं। इससे गुदाद्वार की नसों पर दवाब पडता है। जिसके परिणामस्वरूप ये नसें सूजकर बडी हो जाती है और मसों का रूप ले लेती है। गर्भावस्था और प्रसूति के दौरान यह समस्या ज्यादा होती है जिसके कारण बवासीर होने का भ्रम भी हो जाता है।

क्या शुरुआत में ही इसे रोकने का कोई उपाय है?

आप जितना ज्यादा हो सके अपने भोजन में रेशेदार पदार्थ ज्यादा शामिल करें। खाद्यान्न अधिक खाएं, फल व सब्जी का उपयोग ज्यादा करें। रेशेदार और तरल पदार्थ आप के मल को कम कर देते हैं। जिससे यह आंतों के जरिए सहजता से फिसलकर बाहर आ जाता है। यानि आप अपने भोजन में अतिरिक्त रेशेदार पदार्थ शामिल करना चाहें या अपने वजन पर नियंत्रण रखना चाहें तो अपने डॉक्टर से अपनी आहार तालिका संबंधी सलाह लें।

पाइल्स और फिशर का फर्क जानें कई बार पाइल्स और फिशर में लोग कंफ्यूज हो जाते हैं। फिशर भी गुदा का ही रोग है, लेकिन इसमें गुदा में क्रैक हो जाता है। यह क्रैक छोटा सा भी हो सकता है और इतना बड़ा भी कि इससे खून आने लगता है।

पाइल्स की चार स्टेज:-

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  • स्टेज 1 : यह शुरुआती स्टेज होती है। इसमें कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसे पाइल्स हैं। मरीज को कोई खास दर्द महसूस नहीं होता। बस हल्की सी खारिश महसूस होती है और जोर लगाने पर कई बार हल्का खून आ जाता है। इसमें पाइल्स अंदर ही होते हैं।
  • स्टेज 2: दूसरी स्टेज में मल त्याग के वक्त मस्से बाहर की ओर आने लगते हैं, लेकिन हाथ से भीतर करने पर वे अंदर चले जाते हैं। पहली स्टेज की तुलना में इसमें थोड़ा ज्यादा दर्द महसूस होता है और जोर लगाने पर खून भी आने लगता है।
  • स्टेज 3 : यह स्थिति थोड़ी गंभीर हो जाती है क्योंकि इसमें मस्से बाहर की ओर ही रहते हैं। हाथ से भी इन्हें अंदर नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में मरीज को तेज दर्द महसूस होता है और मल त्याग के साथ खून भी ज्यादा आता है।
  • स्टेज 4 : ग्रेड 3 की बिगड़ी हुई स्थिति होती है। इसमें मस्से बाहर की ओर लटके रहते हैं। जबर्दस्त दर्द और खून आने की शिकायत मरीज को होती है। इंफेक्शन के चांस बने रहते हैं।

क्या हैं लक्षण –

मल त्याग करते वक्त तेज चमकदार रक्त का आना या म्यूकस का आना। – एनस के आसपास सूजन या गांठ सी महसूस होना। – एनस के आसपास खुजली का होना। – मल त्याग करने के बाद भी ऐसा लगते रहना जैसे पेट साफ न हुआ हो। – पाइल्स के मस्सों में सिर्फ खून आता है, दर्द नहीं होता। अगर दर्द है तो इसकी वजह है इंफेक्शन।

कारण क्या हैं –

कब्ज पाइल्स की सबसे बड़ी वजह होती है। कब्ज होने की वजह से कई बार मल त्याग करते समय जोर लगाना पड़ता है और इसकी वजह से पाइल्स की शिकायत हो जाती है। – ऐसे लोग जिनका काम बहुत ज्यादा देर तक खड़े रहने का होता है, उन्हें पाइल्स की समस्या हो सकती है। – गुदा मैथुन करने से भी पाइल्स की समस्या हो सकती है। – मोटापा इसकी एक और अहम वजह है। – कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान भी पाइल्स की समस्या हो सकती है। – नॉर्मल डिलिवरी के बाद भी पाइल्स की समस्या हो सकती है।

इलाज के तरीके

ऐलोपैथी:-

दवाओं सेः अगर पाइल्स स्टेज 1 या 2 के हैं तो उन्हें दवाओं से ही ठीक किया जा सकता है। सर्जरी की जरूरत नहीं होती।

ऑपरेशन रबर बैंड लीगेशन (Rubber Band Ligation) अगर मस्से थोड़े बड़े हैं तो रबर बैंड लीगेशन का प्रयोग किया जाता है। इसमें मस्सों की जड़ पर एक या दो रबर बैंड को बांध दिया जाता है, जिससे उनमें ब्लड का प्रवाह रुक जाता है। इसमें डॉक्टर एनस के भीतर एक डिवाइस डालते हैं और उसकी मदद से रबर बैंड को मस्सों की जड़ में बांध दिया जाता है। इसके बाद एक हफ्ते के समय में ये पाइल्स के मस्से सूखकर खत्म हो जाते हैं। एनैस्थिसिया देने की जरूरत नहीं होती। एक बार में दो-तीन मस्सों को ही ठीक किया जाता है। इसके बाद मरीज को दोबारा बुलाया जाता है। इसमें भी अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती। इस प्रॉसेस को करने के 24 से 48 घंटे के भीतर मरीज को दर्द महसूस हो सकता है, जिसके लिए डॉक्टर दवाएं दे देते हैं।

स्कलरोथेरपी (Sclerotherapy) इस तरीके का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब मस्से छोटे होते हैं। स्टेज 1 या 2 तक इस तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मरीज को एक इंजेक्शन दिया जाता है। इससे मस्से सिकुड़ जाते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे शरीर के द्वारा ही अब्जॉर्ब कर लिए जाते हैं।

हेमरॉयरडक्टमी (Haemorrhoidectomy) मस्से अगर बहुत बड़े हैं और दूसरे तरीके फेल हो चुके हैं तो यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह सर्जरी का परंपरागत तरीका है। इसमें अंदर के या बाहर के मस्सों को काटकर निकाल दिया जाता है। इसमें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत होगी। रिकवरी में दो से तीन हफ्ते का समय लग सकता है। सर्जरी के बाद कुछ दर्द महसूस हो सकता है। सर्जरी के बाद पहली बार मल त्याग में कुछ खून आ सकता है। सर्जरी कामयाब है और कोई रिस्क नहीं है, लेकिन सर्जरी के बाद भी यह जरूरी है कि मरीज अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करे, कब्ज से बचे और फाइबर डाइट ले। ऐसा न करने पर करीब 5 फीसदी मामलों में सर्जरी के बाद भी पाइल्स दोबारा हो सकते हैं।

स्टेपलर सर्जरी (Stapler Surgery) स्टेज 3 या 4 के पाइल्स के लिए ही इस तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में भी जनरल, रीजनल और लोकल एनैस्थिसिया दिया जाता है। अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। प्रोलैप्स्ड पाइल्स (बाहर निकले हुए मस्से) को एक सर्जिकल स्टेपल के जरिये वापस अंदर की ओर भेज दिया जाता है और ब्लड सप्लाई को रोक दिया जाता है जिससे टिश्यू सिकुड़ जाते हैं और बॉडी उन्हें अब्जॉर्ब कर लेती है। इस प्रक्रिया में हेमरॉयरडक्टमी के मुकाबले कम दर्द होता है और रिकवरी में वक्त भी कम लगता है।

होम्योपैथी:-

स्टेज 1 और स्टेज 2 के पाइल्स के लिए होम्योपैथी में बहुत अच्छा इलाज है और कई मामलों में स्टेज 3 के पाइल्स को भी इसकी मदद से ठीक किया जा सकता है। पाइल्स के बहुत कम मामले ऐसे होते हैं, जिनमें सर्जरी की जरूरत होती है। बाकी पाइल्स दवाओं से ही ठीक हो सकते हैं। साथ ही शुरुआती स्टेज के पाइल्स में एकदम सर्जरी की ओर जाने से बचना चाहिए। इंतजार करें, दवा लें और बचाव के तरीकों पर ज्यादा ध्यान दें। एक से दो महीने तक लगातार इलाज कराने से पाइल्स की समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है। पाइल्स के साथ अक्सर यह समस्या होती है कि एक बार ठीक होने के बाद ये दोबारा हो जाते हैं। इस समस्या के लिए होम्योपैथी में अलग से दवा दी जाती है।

आयुर्वेद:-

आयुर्वेदिक औषधियों को अपनाकर बवासीर से छुटकारा पाया जा सकता है। औषधियों के प्रयोग के अलावा अपनी आंतों की गतिविधियों को सामान्‍य रखने के लिये, फल, सब्ज़ियां, ब्राउन राईस, ब्राउन ब्रेड जैसे रेशेयुक्त आहार का सेवन करे और ज्‍यादा मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन करे।

Our Treatment

डॉ मोंगा पाइल्स क्लिनिक में कम से कम रिकवरी समय के साथ दर्द रहित पाइल्स का इलाज

बवासीर या पाईल्‍स, इसका चिकित्‍सकीय नाम हैमरॉइड है। बवासीरकी बीमारी होने पर इसका का दर्द बेहद असहनीय होता है। आजकल बवासीर की बीमारी कई लोगों में देखने को मिलती है। देखा जाए, तो बवासीर की बीमारी विशेष रूप से बदलती दिनचर्या और खानपान के कारण होती है। बवसीर की बीमारी का यदि समय पर यह ज्‍यादा दर्द देने वाली हो सकती है, जो कि खूनी बवासीर का रूप ले सकती है। बवासीर दो तरह की होती है- बाहरी व अंदरूनी बवासीर। अंदूरूनी बवासीर में मलाशय के आस-पास की नसों में सूजन होती है और बाहरी बवासीर में गूदे के बाहर सूजन होती है। यदि आप भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं, तो आप डॉ मोंगा मेडी क्लिनिक में आयुर्वेदिक तरीकों से बवासीर के छुटकारा पा सकते हैं। 

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